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कोसमी से 3 हजार से अधिक लोगों का पैदल मार्च जारी, 17 को सीएम हाउस का करेंगे घेराव

सीहारे। जिले की भैरूंदा तहसील के ग्राम कोसमी में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और जंगल से बेदखली के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इसके विरोध में गुरुवार सुबह 11 बजे आदिवासी समाज के महिला, पुरुष और बच्चे बड़ी संख्या में कोसमी से राजधानी भोपाल के लिए पदयात्रा पर निकल पड़े।
नाराज आदिवासियों दावा है कि इस पैदल मार्च में 3 हजार से अधिक लोग शामिल हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समक्ष अपनी बात रखने और न्याय मांगने के लिए यह कारवां 80 किलोमीटर से अधिक का लंबा सफर पैदल तय कर रहा है।
डेढ़ किलोमीटर लंबी रैली और हाथों में तख्तियां
पदयात्रा की शुरुआत के दौरान सडक़ पर आदिवासी समाज के लोगों की करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी रैली नजर आई। हाथों में तख्तियां और बैनर थामे प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की। इस पदयात्रा में सिर्फ युवा और बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं और छोटे बच्चे भी अपने अधिकारों की लड़ाई लडऩे के लिए साथ चल रहे हैं। कडक़ड़ाती धूप और लंबे रास्ते की परवाह किए बिना आंदोलनकारियों के कदम राजधानी की ओर बढ़ रहे हैं।
क्यों भडक़ा है आदिवासियों में आक्रोश
बता दें कोसमी गांव में वन विकास निगम की कार्रवाई के दौरान 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़ दिए गए थे, जिससे उनके सामने रहने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। आदिवासियों का आरोप है कि उनके घरों को उजाडऩे के साथ-साथ पीने के पानी के कुओं को भी पाट दिया गया है, जिससे उनके सामने जीवनयापन की बड़ी मुसीबत आ गई है। इस पूरे आंदोलन में खिवनी अभयारण्य क्षेत्र के 35 से अधिक गांवों के आदिवासियों के भी शामिल होने की बात सामने आ रही है, जो जंगल से बेदखली का विरोध कर रहे हैं। दूसरी ओर वन विभाग का अपना तर्क है कि यह पूरी कार्रवाई आरक्षित वन भूमि पर किए गए कथित अतिक्रमण को हटाने के लिए की गई थी।
मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा आंदोलन
आदिवासियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात नहीं होती और उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकलता तब तक वे पीछे नहीं हटेंगे। उनका संकल्प है कि वे मांगें पूरी होने तक भोपाल में ही डेरा डालकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। कोसमी से भोपाल तक शुरू हुआ यह पैदल मार्च अब सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है, क्या प्रभावित आदिवासी परिवारों को न्याय मिलेगा या जंगल की जमीन को लेकर यह विवाद और गहराएगा।

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