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सीएम मोहन यादव की बड़ी पहल, नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों में पहुंचेगी विकास की रोशनी, जनता से पूछकर बनेगी योजना

भोपाल। मध्य प्रदेश से नक्सलवाद के खात्मे के बाद अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इन क्षेत्रों के विकास का बीड़ा उठाया है। सरकार ने बालाघाट जिले के नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों को चिह्नित कर वहां विकास की एक नई शुरुआत की है। इन गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए सीएम के निर्देश पर एक व्यापक अभियान शुरू किया गया है, जिसके तहत अधिकारी खुद गांव-गांव पहुंचकर जनता से चर्चा कर रहे हैं और उनकी राय के आधार पर विकास की कार्य-योजना तैयार की जा रही है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की इस पहल के तहत नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों को चार क्लस्टर में बांटा गया है। विभिन्न विभागों के अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे अगले 14 दिनों तक गांवों का दौरा करें। अधिकारी गांवों में जाकर वहां की बुनियादी सुविधाओं का जायजा ले रहे हैं और ग्रामीणों की जरूरतें समझकर विकास प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आजीविका के अवसरों का विस्तार करना है।

अधिकारियों ने संभाला मोर्चा, ग्रामीणों से की सीधी बात
अभियान के दौरान कलेक्टर आदित्य सिंह, जिला पंचायत सीईओ, एसडीएम और विभिन्न विभागों के अधिकारी लगातार गांवों का दौरा कर रहे हैं। बैहर, बिरसा, लांजी और किरनापुर विकासखंड के गांवों में पहुंचकर अधिकारियों ने ग्रामीणों, किसानों और युवाओं से संवाद किया। उन्होंने कट्टीपार, सतोना, बरगुड़, देवरबेली, दड़ेकसा, बिलालकसा, सीतापार और बोरवन समेत कई गांवों में जाकर स्थानीय समस्याओं और जरूरतों की जानकारी जुटाई। साथ ही छात्रावासों और शासकीय व्यवस्थाओं का भी निरीक्षण किया गया।

सडक़, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पूरा फोकस
अधिकारी इन गांवों में सडक़, पुल-पुलिया, पेयजल, सिंचाई, बिजली, स्कूल और आंगनबाड़ी भवन जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति का बारीकी से आकलन कर रहे हैं। यह पता लगाया जा रहा है कि किस क्षेत्र में किस सुविधा की सबसे ज्यादा जरूरत है, ताकि प्राथमिकता के आधार पर उनका समाधान किया जा सके। इसके अलावा पात्र हितग्राहियों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ दिलाने के भी निर्देश दिए गए हैं।

रोजगार और स्वरोजगार के बढ़ेंगे अवसर
प्रशासन का मुख्य जोर ग्रामीण इलाकों में कृषि, उद्यानिकी,े पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन जैसी स्वरोजगार गतिविधियों को बढ़ावा देना है। स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों की रुचि के अनुसार आजीविका के नए साधन विकसित किए जा रहे हैं, ताकि लोगों को अपने ही गांव में रोजगार मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके।

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