बुधनी में सियासत का हाईवोल्टेज ड्रामा, शिवराज के बाद बेटे कार्तिकेय भी आदिवासियों के समर्थन में धरने पर बैठे

भोपाल। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा क्षेत्र इन दिनों सियासी भूचाल का केंद्र बनी हुई है। ग्राम कोसमी में आदिवासियों के मकान तोड़े जाने और फसलें नष्ट किए जाने के मामले ने अब बड़ा राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। इस संवेदनशील और गर्माते घटनाक्रम के बीच पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बाद अब उनके बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान भी मैदान में उतर आए हैं और आदिवासियों के साथ धरने पर बैठ गए हैं।
मामला सीहोर के कोसमी गांव का है, जहां 11 अक्टूबर को प्रशासन द्वारा आदिवासियों के 12 मकानों पर बुलडोजर चला दिया गया था। इस कार्रवाई के बाद से पीडि़त परिवारों के समक्ष गंभीर संकट खड़ा हो गया है। सोमवार की शाम जैसे ही कार्तिकेय सिंह चौहान कोसमी गांव पहुंचे, वहां का राजनीतिक और सामाजिक माहौल पूरी तरह बदल गया। कार्तिकेय न केवल धरने पर बैठेए बल्कि उन्होंने वहां मौजूद मासूम बच्चों को दुलारकर और पीडि़त परिवारों से मिलकर यह जताने की पूरी कोशिश की कि वे इस दुखद और कठिन घड़ी में आदिवासियों के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।
राष्ट्रीय जनजाति आयोग का कड़ा रुख, 3 दिन में मांगा जवाब
इस प्रशासनिक कार्रवाई पर अब कानूनी शिकंजा भी कसता नजर आ रहा है। मीडिया रिपोट्र्स और खबरों का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने मध्यप्रदेश सरकार को कड़ा नोटिस थमा दिया है। आयोग ने मुख्य सचिव, डीजीपी, वन विभाग के प्रमुख सचिव, सीहोर कलेक्टर और एसपी समेत तमाम संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर महज 3 दिन के भीतर विस्तृत जवाब और दस्तावेज पेश करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने कड़ी चेतावनी दी है कि यदि तय समय के भीतर जवाब नहीं दिया गया तो समन जारी किया जा सकता है। यह पूरा विवाद वन विकास निगम की विवादास्पद कार्रवाई से जुड़ा हुआ है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने साधा निशाना
घटना के बाद से राजनीतिक गलियारों में जुबानी जंग तेज हो गई है। केंद्रीय कृषि मंत्री और स्थानीय सांसद शिवराज सिंह चौहान ने इस कार्रवाई पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा था कि उनके क्षेत्र में जुल्म और अन्याय की पराकाष्ठा हो गई है। वहींए जब इस पूरे मामले को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि प्रशासन से पूरी रिपोर्ट तलब कर ली गई है और जांच के बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
फिलहालए इस हाईवोल्टेज ड्रामे के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि वन विकास निगम की इस कार्रवाई के पीछे असली जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन की जांच के बाद वाकई इन बेसहारा आदिवासियों को न्याय मिल पाएगा या फिर यह पूरा मामला सिर्फ राजनीतिक दांवपेंच बनकर ही रह जाएगा।



