राघवजी के बाद से एमपी में बंद हुआ नैतिक आधार पर इस्तीफे का दौर

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दौर वह भी था जब सार्वजनिक जीवन में मर्यादा टूटने, भ्रष्टाचार के आरोप लगने या कोई बड़ा विवाद सामने आने पर जनप्रतिनिधि नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया करते थे, लेकिन वर्तमान दौर में यह परिपाटी पूरी तरह बदलती दिख रही है। प्रदेश में अब राजनीतिक नैतिकता के आधार पर पद छोडऩे का रिवाज लगभग खत्म सा हो गया है।
सियासी जानकारों की मानें तो मध्यप्रदेश में नैतिक आधार पर किसी मंत्री का आखिरी बार नैतिकता के आधार पर इस्तीफा लिया, 5 जुलाई 2013 को जैसे ही उनके घरेलू सहायक कर्मचारी ने पुलिस में यौन शोषण की शिकायत दर्ज कराई और विवादित सीडी सामने आई, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें फोन कर तुरंत पद से इस्तीफा देने के निर्देश दिए थे। इस्तीफा लेने के दो दिन के भीतर ही बीजेपी ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। उस वाकये के बाद से लेकर अब तक प्रदेश की राजनीति में कई सियासी तूफान आए, गंभीर आरोप लगे, लेकिन नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की परंपरा को जैसे विराम ही लग गया है।
विपक्ष का हंगामा और सोशल मीडिया का दबाव भी बेअसर
आज के दौर में यदि किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, विवादित बयानबाजी होती है या कोई जमीन घोटाले का मामला सामने आता है तो विपक्ष भले ही कितना भी सडक़ से सदन तक हंगामा कर ले, वह केवल बयानों तक सीमित रह जाता है।
सोशल मीडिया पर भले ही संबंधित नेताजी के खिलाफ ट्रेंड चल रहे हों या जनता में नाराजगी दिखे, लेकिन न तो नेता खुद इस्तीफा देने की पेशकश करते हैं और न ही सरकार की ओर से ऐसा कोई कड़ा कदम इस्तीफा मांगने जैसा उठाया जाता है।
बयानों से लेकर आरोपों तक, कोई असर नहीं
मध्यप्रदेश के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर मंत्री विजय शाह द्वारा दिया गया बयान जबरदस्त सुर्खियों में रहा। उस वक्त भारी विरोध के बावजूद मामले को बयानों और सफाई के जरिए शांत कर दिया गया। जमीन से जुड़े विवाद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। बावजूद इसके किसी भी मामले में इस्तीफा लेने या देने की नौबत नहीं आई।
राघवजी के बाद कैसे बदली राजनीति
साल 2013 में तत्कालीन वित्त मंत्री राघवजी पर लगे आरोपों के बाद संगठन और सरकार ने उनसे तुरंत इस्तीफा ले लिया था। उस समय इसे भाजपा की जीरो टॉलरेंस और नैतिक राजनीति की मिसाल के तौर पर देखा गया था। लेकिन उसके बाद से राजनीतिक दलों का रवैया रक्षात्मक होता चला गया।



