हरदीप सिंह पुरी के सामने ताल ठोकने आ गए कांते सयन्ना, 50 से ज्यादा चुनाव लड़ चुके तेलंगाना के शख्स की अनोखी जिद

भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक खाली सीट पर होने वाले उपचुनाव का सियासी पारा गर्माया हुआ है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी जीत लगभग तय मानी है, वहीं दूसरी तरफ मैदान में एक ऐसा निर्दलीय चेहरा उतरा है जिसकी कहानी सुनकर हर कोई हैरान है। तेलंगाना के हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाले कांते सयन्ना ने इस सीट के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है, जो अपने जीवन में 50 से ज्यादा बार चुनाव लड़ चुके हैं।
कांते सयन्ना कोई साधारण राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे देश के सबसे अनोखे चुनावी मुसाफिर हैं। उनके चुनावी इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो आंकड़े चौंका देते हैं…
5 बार लोकसभा चुनाव
8 बार विधानसभा चुनाव
6 बार विधान परिषद का चुनाव
10 से 12 बार राज्यसभा चुनाव के लिए प्रयास
यहां तक कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में शामिल उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी वे अपनी उम्मीदवारी ठोक चुके हैं।
भोपाल पहुंचे सयन्ना
हाल ही में सयन्ना अपने सभी जरूरी दस्तावेज और शपथ-पत्र लेकर हैदराबाद से सीधे भोपाल पहुंचे और विधानसभा से नामांकन फॉर्म भी प्राप्त कर लिया, लेकिन उनके इस बड़े अरमान के रास्ते में एक कानूनी और व्यावहारिक दीवार खड़ी है।
नियमों के मुताबिक राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा भरने के लिए कम से कम 10 विधायकों के प्रस्तावकों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। सयन्ना का आरोप है कि मध्य प्रदेश में कोई भी विधायक खुलकर उनका समर्थन करने और हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हो रहा है। स्थानीय विधायकों और राजनीतिक दलों को डर है कि किसी निर्दलीय को समर्थन देने से उनकी पार्टी में भूचाल आ सकता है या मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। हालांकि इसके बावजूद वे उम्मीद जता रहे हैं कि कुछ विधायक उनका साथ देंगे और वे यह जादुई आंकड़ा जुटा लेंगे।
मार्च में तेलंगाना में भी आई थी ऐसी ही आफत
यह कोई पहली बार नहीं है जब सयन्ना को इस संकट का सामना करना पड़ रहा है। इसी साल मार्च के महीने में जब तेलंगाना में दो राज्यसभा सीटों के चुनाव हुए थे, तब भी सयन्ना ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोकी थी, तब भी 10 विधायकों का समर्थन न मिल पाने के कारण उनका नामांकन जांच के दौरान खतरे में पड़ गया था। मध्य प्रदेश की आबोहवा में भी उनके सामने वही पुरानी और कठिन चुनौती मुंह बाए खड़ी है।



