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सीएम का बड़ा ऐलान: भगवान श्रीकृष्ण के जहां-जहां पड़े चरण, उन स्थलों को श्रीकृष्ण तीथ के रूप में विकसित करेगी सरकार

भोपाल। मध्यप्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण की स्मृतियों को सहेजने और उनकी महिमा को जन-जन तक पहुुंचाने के लिए प्रदेश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि मध्यप्रदेश की पावन धरा पर भगवान श्रीकृष्ण के चरण जहां-जहां पड़े हैं, उन सभी स्थलों को चिन्हित कर राज्य सरकार उन्हें श्रीकृष्ण तीर्थ के रूप में भव्यता से विकसित कर रही है।
बुधवार शाम भोपाल के रवीन्द्र भवन स्थित मुक्ताकाश मंच पर आयोजित सात दिवसीय रासलीला समारोह के पांचवें दिन मुख्यमंत्री डॉ. यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने मंच पर राधा-कृष्ण की जीवित झांकी बने कलाकारों की विशेष आरती उतारी, उनसे आशीर्वाद लिया और प्रदेशवासियों को जन्माष्टमी तथा हलषष्ठी की बधाई दी। इस दौरान मुख्यमंत्री ने बताया कि वे स्वयं 3 सितंबर को गुजरात के पवित्र धाम द्वारका के भ्रमण पर जा रहे हैं।
कान्हा से जगद्गुरु तक का सफर संघर्षों से भरा रहा
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन कभी आसान नहीं रहा। जन्म लेते ही जिन्हें मार डालने का प्रयास किया गया हो, उनका कान्हा से लेकर श्रीकृष्ण वन्दे जगद्गुरु की उपाधि पाने तक का सफर बेहद संघर्षमय और कठिन परिस्थितियों से गुजरा।
सीएम डॉ. यादव ने कहा निराशा के घनघोर आभामंडल के बावजूद भगवान श्रीकृष्ण ने चुनौतियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा और अपने जीवन का सदुपयोग किया। उन्होंने जीवन में कभी मोह नहीं रखा। जिस व्यक्ति या वस्तु से उनका सामना हुआ, वहां से आगे बढऩे के बाद वे कभी मुडक़र वापस नहीं लौटे।
मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि श्रीकृष्ण 64 कलाओं, 14 विद्याओं और 18 पुराणों में निष्णात थे। विश्व कल्याण के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का अमर ज्ञान भी योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से ही निकला। मध्यप्रदेश से उनका गहरा नाता रहा, क्योंकि वे यहीं आकर शिक्षित-दीक्षित हुए और कान्हा से भगवान श्रीकृष्ण बने।
ब्रज के कलाकारों ने जीवंत की गोवर्धन लीला और रास
संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस रासलीला समारोह के पांचवें दिन मथुरा के सुविख्यात निर्देशक माधव आचार्य के निर्देशन में ब्रज से आए पारम्परिक कलाकारों ने श्री गोवर्धन लीला एवं रास की भूमिका का मनमोहक मंचन किया। ब्रज बोली में प्रस्तुत गोवर्धन लीला के माध्यम से प्रकृति प्रेम, अहंकार के विनाश और ईश्वर-भक्ति का अद्भुत संदेश दिया गया।
दर्शकों ने देखा कि किस प्रकार बालकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के बजाय प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की पूजा का महत्व समझाया और बाद में मूसलाधार वर्षा से रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठिका उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरे ब्रज को आश्रय दिया। इसके बाद मधुर वंशी वादन और गोपियों के अनन्य प्रेम के माध्यम से जीवात्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन यानी रास की अनुपम छटा बिखरी।
भक्ति के सुरों से सराबोर हुई सुरमई शाम
रासलीला के साथ-साथ सांस्कृतिक संध्या भी कृष्ण-भक्ति के रंग में रंगी नजर आई। जबलपुर की सुश्री रूपाली कुसुमकर एवं उनके साथियों ने सुरीली प्रस्तुतियां दीं। श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, एक राधा एक मीरा, श्याम तेरी बंस और राम सिया रा जैसे कालजयी भजनों ने रवीन्द्र भवन में मौजूद सैकड़ों श्रोताओं को आनंद और भक्ति-रस से सराबोर कर दिया।

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