पढ़े, महायोगी दादा गुरू से नितिन ठाकुर की विशेष बातचीत…

क्या कोई इंसान बिना अन्न और जल के ज्यादा दिन जीवित रह सकता है, मेडिकल साइंस की किताबों में इसका जवाब ‘ना’ है, लेकिन नर्मदा किनारे चल रही एक ‘जीवित साधना’ ने आधुनिक विज्ञान को सोच में डाल दिया है. पिछले 6 वर्षों से अन्न का एक दाना छुए बिना और अब जल की एक बूंद पिए बिना मां नर्मदा की परिक्रमा कर रहे महायोगी दादा गुरु महाराज (समर्थ भैया जी सरकार) आज के दौर में किसी चमत्कार से कम नहीं हैं. नितिन ठाकुर ने सीहोर के बाबरी गांव पहुंचकर दादा गुरु से जाना कि आखिर वो कौन सी दिव्य ऊर्जा है, जो बिना भोजन के भी उनके चेहरे पर तेज और शरीर में अद्भुत स्फूर्ति बनाए रखती है.
नितिन ठाकुर: महाराज जी आधुनिक विज्ञान और मेडिकल साइंस कहता है कि भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है, लेकिन आप 6 वर्षों से निराहार हैं. पहले आप दिन में एक बार नर्मदा जल लेते थे, अब वो भी बंद है. इस अद्भुत योग शक्ति के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
दादा गुरु महाराज: बेटा यह शरीर केवल अन्न से नहीं, संकल्प और उस परम शक्ति से चलता है. यह योग की वह अवस्था है जहां शरीर को स्थूल भोजन की आवश्यकता नहीं रहती. यह मां नर्मदा की कृपा और संकल्प की शक्ति है. जब उद्देश्य निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर जन-कल्याण हो जाता है तो प्रकृति स्वयं ऊर्जा देने लगती है.
नितिन ठाकुर: भोजन त्यागने के बाद शरीर और मन में क्या बदलाव आता है. आप इतनी कठिन यात्रा कर रहे हैं फिर भी आपके चेहरे पर यह तेज और ऊर्जा कैसे बनी रहती है?
दादा गुरु महाराज: भोजन छोडऩे के बाद मन की चंचलता समाप्त हो जाती है. शरीर हल्का और चेतना जागृत रहती है. यह ऊर्जा मेरी नहीं, मां नर्मदा की है. मैं तो केवल एक माध्यम हूं, जो लोग भौतिकवाद में फंसे हैं, उन्हें समझना होगा कि आत्मा की खुराक भक्ति है, अन्न नहीं.
नितिन ठाकुर: आपकी इस अवस्था पर कई बार शोध भी हुआ है, जो लोग केवल विज्ञान पर भरोसा करते हैं, उन्हें आपकी यह तपस्या क्या संदेश देती है?
दादा गुरु महाराज: विज्ञान वहां समाप्त होता है जहां से अध्यात्म शुरू होता है. शोध करने वाले अपनी मशीनें लाते हैं, लेकिन वे विश्वास को नहीं माप सकते. मेरी तपस्या का संदेश यही है कि मनुष्य अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचाने. हम प्रकृति से जुड़े रहेंगे तो प्रकृति हमारा पोषण करेगी.
नितिन ठाकुर: महाराज जी आपकी यह चौथी परिक्रमा केवल भक्ति तक सीमित नहीं है. इसमें स्वच्छता और प्लास्टिक मुक्ति का बड़ा संकल्प है. आप भक्तों से नर्मदा की शुद्धता के लिए क्या कहना चाहेंगे?
दादा गुरु महाराज: नर्मदा हमारी मां है और मां के आंचल को मैला करना पाप है. हमने संकल्प लिया है कि परिक्रमा मार्ग को कचरा मुक्त रखेंगे. मैं भक्तों से यही कहता हूं कि नर्मदा किनारे प्लास्टिक न फेंकें और जल की पवित्रता बनाए रखें, अगर नर्मदा बचेगी, तभी मानवता बचेगी.
नितिन ठाकुर: आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रही है, उनके लिए नर्मदा तट से आपका क्या संदेश है?
दादा गुरु महाराज: युवाओं से यही कहूंगा कि अपनी जड़ों को न भूलें. आधुनिक बनें, लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कारों की बलि देकर नहीं. असली शांति सुख-सुविधाओं में नहीं, सेवा और साधना में है.
नितिन ठाकुर: आपके साथ 1300 श्रद्धालु चल रहे हैं. परिक्रमा में मार्ग की कठिनाइयों और कष्टों को भक्ति में कैसे बदला जाए?
दादा गुरु महाराज: जब लक्ष्य प्रभु के चरणों में हो तो पैरों के छाले महसूस नहीं होते. परिक्रमा एक साधना है जहां हर कष्ट अहंकार को मिटाता है. जब भक्त मैं छोडक़र हम और मां में समाहित हो जाता है तो कष्ट आनंद बन जाता है.
नितिन ठाकुर: वर्तमान में दुनिया में अशांति है, आपकी इस साधना का विश्व शांति से क्या संबंध है?
दादा गुरु महाराज: जब व्यक्ति भीतर से शांत होता है, तभी समाज और विश्व शांत होगा. मेरी यह तपस्या विश्व कल्याण और प्रकृति के संरक्षण के लिए है. शांति शस्त्रों से नहीं, शास्त्र और साधना से आएगी.



